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और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयो ग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य(सेवा की शर्तें और पदावधि) नियम 2004

जनजातीय कार्य मंत्रालय

अधिसूचना

नई दिल्ली, 20 फरवरी, 2004

सा.का.नि. 128(ङ)

राष्ट्रपति, संविधान के अनुच्छेद 338 क के खंड (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य(सेवा की शर्तें और पदावधि) नियम, 1990 को, उन बातों के सिवाय अधिक्रान्त करते हुए, जिन्हें ऐसे अधिक्रमण से पूर्व किया गया है या करने से लोप किया गया है, निम्नलिखित नियम बनाते हैं, अर्थात्ः-

1.संक्षिप्त नाम और प्रारम्भः

(1) इन नियमों का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य (सेवा की शर्तें और पदावधि) नियम, 2004 है।

(2) ये संविधान (नवासीवां संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारम्भ की तारीख को प्रवृत्त होंगे।

2.परिभाषाएं

 इन नियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) "अनुच्छेद " से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है;

(ख) "अध्यक्ष " से आयोग का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ग) "आयोग " से अनुच्छेद 338 क के अधीन स्थापित राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अभिप्रेत है;

(घ) "सदस्य " से आयोग का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी हैं;

(ङ) "अनुसूचित जनजाति " पद का वही अर्थ हैं जो अनुच्छेद 366 के खंड (25) में हैं;

(च) "उपाध्यक्ष " से आयोग का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है।

3.अर्हताएं

(1) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति ऐसे योगय, निष्ठावान और प्रतिष्ठावान व्यक्तियों में से की जाएगी जिन्होंने अनुसूचित जनजातियों के लिए न्याय के प्रति नःस्वार्थ सेवा में योगदान दिया है ।

(2) उप नियम (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए;-

(क) अध्यक्ष की नियुक्ति अनुसूचित जनजातियों के ऐसे प्रतिष्ठित सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं में से की जाएगी जो अपने विशिष्ट व्यक्तित्व और नःस्वार्थ सेवा के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के बीच विश्वास पैदा करते हैं;

(ख) उपाध्यक्ष और अन्य सभी सदस्य जिनमें कम से कम दो अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे;

(ग) कम से कम एक अन्य सदस्य, महिलाओं में से नियुक्त किया जाएगा।

4.पदावधः

(1) इन नियमों में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य ऐसी तारीख से, जिसको वह ऐसा पद ग्रहण करता है, तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा।

(2) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य दो पदावधियों से अधिक के लिए नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे ।

5.वेतन और भत्तेः

(1)जब तक कि अन्यथा विनिर्दिष्ट न किया जाए,अध्यक्ष भारत सरकार के मंत्रिमंडल सदस्य की पंक्ति का होगा तथा उपाध्यक्ष राज्य मंत्री की पंक्ति का और सदस्य भारत सरकार के सचिव की पंक्ति के होंगे ।

(2) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे जो भारत सरकार के सचिव हो अनुज्ञेय हैं :

परन्तु अध्यक्ष किरायामुक्त आवास का भी हकदार होगा ,

(3)उपनियम (1) और उपनियम (2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, संसद या किसी राज्य विधान-मंडल का सदस्य है तो वह यथास्थिति, संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 (1959 का 10) की धारा 2 के खंड (क) में परिभाषित भत्तों से भिन्न या ऐसे भत्तों से भिन्न, यदि कोई हों, किसी पारिश्रमिक का हकदार नहीं होगा जो राज्य के विधान-मंडल का कोई सदस्य, राज्य विधान-मंडल की सदस्यता के लिए निरर्हता के निवारण से संबंधित राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसी निरर्हता उपगत किए बिना प्राप्त कर सकेगा।

6.स्थायी या अस्थायी रिक्तियों की दशा में व्यवस्था

(1)यदि अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है, या यदि अध्यक्ष किसी कारण से अनुपस्थित है या अपने पद के कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तो उन कर्त्तव्यों का निर्वहन, उपाध्यक्ष द्वारा तब तक किया जाएगा जब तक यथास्थिति, नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है या विद्यमान अध्यक्ष अपने पद को फिर से नहीं संभाल लेता है।

(2)यदि उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है, या यदि उपाध्यक्ष किसी कारण से अनुपस्थित है या अपने पद के कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तो उन कर्त्तव्यों का निर्वहन, ऐसे अन्य सदस्य द्वारा, जैसा राष्ट्रपति निदेश दें, तब तक किया जाएगा जब तक, नया उपाध्यक्ष अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है या विद्यमान उपाध्यक्ष अपने पद को फिर से नहीं संभाल लेता है।

7.अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों के रूप में नियुक्त सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिए विशेष उपबंधः-

जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जो उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश है अथवा कोई सेवानिवृत्त सरकारी सेवक है अथवा किसी अन्य संस्था या स्वायत्त निकाय का सेवानिवृत्त सेवक है और किसी पूर्ववर्ती सेवा की बाबत पेंशन प्राप्त कर रहा है, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य नियुक्त किया जाता है वहां इन नियमों के अधीन उसे अनुज्ञेय वेतन में से उस पेंशन की रकम और यदि उसने पेंशन के किसी भाग के बदले में उसका संराशित मूल्य प्राप्त किया है तो, पेंशन के उस भाग की रकम कम कर दी जाएगी।

8.पदत्याग ओर हटाया जानाः

(1)अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कोई अन्य सदस्य, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा।

(2)(क) अध्यक्ष को केवल कदाचार के आधार पर किए गए राष्ट्रपति के ऐसे आदेश से उसके पद से हटाया जाएगा जो उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति द्वारा निर्देश किए जाने पर ऐसे न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 145 के खंड़ (1) के उपखंड (ञ) के अधीन विहित प्रक्रिया के अनुसार की गई जांच पर यह प्रतिवेदन किए जाने के पश्चात किया गया है कि अध्यक्ष को ऐसे किसी आधार पर हटा दिया जाए;

(ख) राष्ट्रपति, अध्यक्ष को, जिसके संबंध में इस उपनियम के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, उसके पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय का प्रतिवेदन मिलने पर अपना आदेश पारित नहीं कर देता है;

(ग) खंड (क) में किसी बात के होते हुए भी यदि अध्यक्षः

(i) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है, या

(ii) अपनी पदावधि में अपने पद के कर्त्तव्यों के बाहर किसी सवेतन नियोजन में लगता है; या

(iii) राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के लिए अयोग्य है,

तो राष्ट्रपति अध्यक्ष को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा :

परन्तु अध्यक्ष को इस खंड के अधीन पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दिया गया हो ;

(घ) यदि अध्यक्ष, निगमित कम्पनी के सदस्य के रूप में और कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ सम्मिलित रूप से अन्यथा, उस संविदा या करार से, जो भारत सरकार या राज्य सरकार के द्वारा या उसकी ओर से की गई या किया गया है, किसी प्रकार से संपृक्त या हितबद्ध है या हो जाता है या उसके लाभ या उससे उद्भूत किसी फायदे या उपलब्धि में भाग लेता है तो वह खंड़ (क) के प्रयोजनों के लिए कदाचार का दोषी समझा जाएगा ।

(3) राष्ट्रपति, किसी व्यक्ति को उपाध्यक्ष या सदस्य के पद से तभी हटाएगा जब वह व्यक्ति,--

(क) अनुमोचित दिवालिया है;

(ख) किसी अपराध के लिए जिसमें राष्ट्रपति की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है, सिद्धदोष ठहराया जाता है और कारावास में दंडादिष्ट किया जाता है;

(ग) राष्ट्रपति की राय में, मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के लिए अयोग्य है;

(घ) कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने में असमर्थ है;

(ङ) आयोग से अनुपस्थिति की इजाजत लिए बिना आयोग की तीन क्रमवर्ती बैठकों से अनुपस्थित रहता हैः या

(च) राष्ट्रपति की राय में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य की हैसियत का इस प्रकार दुरूपयोग करता है कि उस व्यक्ति का पद पर बने रहना अनुसूचित जनजातियों के हितों के लिए हानिकारक होगाः

परन्तु किसी व्यक्ति को इस उपनियम के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उस व्यक्ति को उस मामले में सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है।

(फा. सं. 17014/12/1999-टीडीआर)

एस. चटर्जी, संयुक्त सचिव.

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